होली और तुम ......
फागुन की मस्ती लिए
सतरंगे बादलों के पार से
कल -कल बहती गंगा की धार से
उमंगो की नाव पर सवार
उछलती -मचलती बहती बयार
सुनहरी किरणों की चुनरी ओढ़कर
घाट पर उतरी है आज ।
पदचाप सुनकर बेचैन हैं साज़
सर्द चेहरे पर धीरे-धीरे उभरती है आस |
चमकती हैं सहमी आस्था की आँखें |
खुलते हैं किवाड़
आ पहुँची है बसन्ती बयार |
मचल उठते हैं सारे रीति-रिवाज़ ।
नाच उठते हैं सारे ढोल-मजीरे
घोटी जाती है भांग कहीं नदी तीरे |
बेचैन होते हैं कैद सारे अबीर-गुलाल
छा जाने को आकाश में ।
ठीक तभी ढूँढने लगता है मन
तुम्हे यहीं- कहीं पास में ।
जीने की इच्छा फिर लेती है अंगडाई
पर बेचैन सी क्यों है आज, यादों की अमराई ।
बसंत -उत्सव का फिर जमने लगा है मेला
रंग है , मस्ती है, पर मन हुआ अकेला ।।
बिखरने लगे हैं रंग
निकलने लगी है टोली ।
व्याकुल मन ढूंढता है तुम्हे
कहाँ हो तुम, ऐ मेरे हमजोली । ।