Monday, December 31, 2012

दस्तक फिर  नए  साल की ।।




दस्तक फिर नए साल की ।
आहट फिर उसी एहसास की ।। 

सजेंगे  फिर, ज़िंदगी के मेले
पलकों पे लगे,  फिर सपनो के डेरे ।।
 होगी अब, ज़िंदगी की जीत ,
नहीं होगी बात ,अब किसी हार की ।।

दस्तक फिर  नए  साल की ।।
आहट फिर उसी एहसास की ।।

 मंजिलों का शायद फिर कोई सफ़र होगा
दुआओं का शायद अब कोई असर होगा ।
आज़ाद काली रात से, अब होगी सहर
होगी जीत फिर से, मन के विश्वास की ।।

दस्तक  फिर नए  साल की ।।
आहट फिर उसी एहसास की ।।

दो जून की रोटी का, ख़त्म अब सवाल होगा
मेरे देश की  धरती सोना उगले, गाता हर किसान होगा ।
टकराकर मायूस जो  लौट आती थी
होगी बुलंद  वही आवाज़
फिर किसी इंसान की ।।

दस्तक फिर  नए  साल की ।।
आहट फिर उसी एहसास की ।।


मुट्ठी में हर किसी के, अब अपना आसमान  होगा
तारों  की झिलमिल में, अब कोई पैगाम होगा ।
खामोश चांदनी रातों में,
 होंगी बातें प्यार की   ।।

दस्तक फिर नए  साल की ।।
आहट फिर उसी एहसास की ।।



करोडों सूनी आंखों मे, फिर जागते हैं सपने ,
पास आएंगे फिर, जो दूर हुए थे अपने ।

बेईमानी की चादर से, जो ढकते गए हर गुनाह,
होंगे बेनकाब सब, ये ललकार है इंसाफ की ।।

दस्तक फिर नए साल की,
आहट फिर उसी एहसास की ।।


करते रहे जो सौदा वतन का, अपना जमीर बेचकर,
भरते गए तिजोरी, औरों का नसीब छीनकर ।

बेबस, लाचार होंगे सब,
है ये आह, सरहद पर खडे जवान की ।।

दस्तक फिर नए साल की,
आहट फिर उसी एहसास की ।।