Sunday, January 4, 2015

आखिर आतंकवाद का खूनी खेल कब तक ?

रक्त-रंजित संस्कृति है,
नर पिशाच करते हैं तांडव |

पराकाष्ठा क्षमादान की,
नीलकंठ बन खडा है मानव ||

आखिर..

नर के भेस में, पिशाच की आकृति कब तक |
नियति मान निर्दोष प्राणों की आहुति कब तक |
मानव रक्त की नरभक्षी को स्वीकृति कब तक |
काल के क्रूर पाश में घायल संस्कृति कब तक |


Thursday, January 1, 2015

                                नव वर्ष की सभी दोस्तों को शुभकामनाएं |
करें स्वागत हम नए वर्ष का ||
नया साल दे रहा है दस्तक,

मुस्कान खिल उठी फिर अधरों पर |

भूल कर कडवाहट हम सब 

करें आह्वान फिर उत्कर्ष का ||

करें स्वागत हम नए वर्ष का ||
नए स्वप्न, उम्मीदों को ले फिर,

चले नए सफ़र पर यारों |

हम सब मिल कर करें जो कोशिश,

नामुमकिन कुछ भी नहीं यारों ||

आशा के हम दीप जब दीप जलाकर 

अभिनन्दन हम करें हर्ष का ||

करें स्वागत हम नए वर्ष का ||
भूली ना जा सकेंगी हमसे

बीते वर्ष की सुनहरी यादें |

खुशहाली की चाह में हमने 

किये थे फौलादी वो इरादे ||

पुकारती है मंजिल फिर हमको 

साथ न छोड़े अपने संकल्प का ||

करें स्वागत हम नए वर्ष का ||