आखिर आतंकवाद का खूनी खेल कब
तक ?
रक्त-रंजित संस्कृति है,
नर पिशाच करते हैं तांडव |
पराकाष्ठा क्षमादान की,
नीलकंठ बन खडा है मानव ||
आखिर..
नर के भेस में, पिशाच की
आकृति कब तक |
नियति मान निर्दोष प्राणों
की आहुति कब तक |
मानव रक्त की नरभक्षी को
स्वीकृति कब तक |
काल के क्रूर पाश में घायल
संस्कृति कब तक |