Sunday, January 4, 2015

आखिर आतंकवाद का खूनी खेल कब तक ?

रक्त-रंजित संस्कृति है,
नर पिशाच करते हैं तांडव |

पराकाष्ठा क्षमादान की,
नीलकंठ बन खडा है मानव ||

आखिर..

नर के भेस में, पिशाच की आकृति कब तक |
नियति मान निर्दोष प्राणों की आहुति कब तक |
मानव रक्त की नरभक्षी को स्वीकृति कब तक |
काल के क्रूर पाश में घायल संस्कृति कब तक |


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