मेरे द्वीप ...
ये धरती जग में निराली ,
फूल खिले डाली-डाली ।
सागर की लहरों पर नय्या,
डोले मगन मतवाली ।।
हरे भरे जंगल की शोभा,
सागर तट पर जियरा नाचे ।
सुनकर पंछी के गुंजन,
रोज़ हमारी सुबह जागे ।।
तारों की झिलमिल रातों को,
देख लहरें इठलाती ।।
ये धरती जग में निराली ,
फूल खिले डाली-डाली ।।
हम मस्ताने, हम दीवाने,
जात-पात का भेद ना जाने ।
पवन बसन्ती के झोंके भी ,
जीवन का संदेशा लाये ।।
है अपना बस ये ही सपना,
इस दुनिया में हो खुशहाली ।।
ये धरती जग में निराली ,
फूल खिले डाली-डाली ।।
ये नदिया, वन, सागर, लहरें,
इनका कोई मोल ना तोले ।
जीवन ये देते सबको,
कोई इनमे ज़हर ना घोले ।।
इनकी रक्षा धर्म हमारा,
करनी है इनकी रखवाली ।।
ये धरती जग में निराली ,
फूल खिले डाली-डाली ।।
(राष्ट्रीय स्तर पर चौथा स्थान हासिल करने वाली मेरी इस कविता को श्री पार्थो दास ने संगीतबद्ध किया और श्रीमती अनुराधा गणेशन ने नृत्य निर्देशन किया )