Tuesday, January 24, 2012

मेरे द्वीप ...
ये धरती जग में निराली ,
फूल खिले डाली-डाली ।
सागर की लहरों पर नय्या, 
डोले मगन मतवाली ।।
                                        
हरे भरे जंगल की शोभा,
सागर तट पर जियरा नाचे ।
सुनकर पंछी के गुंजन,
रोज़ हमारी सुबह जागे ।।
 तारों की झिलमिल रातों को,
देख लहरें इठलाती ।।

ये धरती जग में निराली ,
फूल खिले डाली-डाली ।।

हम मस्ताने, हम दीवाने,
जात-पात का भेद ना जाने ।
पवन बसन्ती के झोंके भी , 
जीवन का संदेशा लाये ।।
है अपना बस ये ही सपना, 
इस दुनिया में हो खुशहाली ।।

ये धरती जग में निराली ,
फूल खिले डाली-डाली ।। 

ये नदिया, वन, सागर, लहरें,
इनका कोई मोल ना तोले ।
जीवन ये देते सबको, 
कोई इनमे ज़हर ना घोले ।।
इनकी रक्षा धर्म हमारा, 
करनी है इनकी रखवाली ।।
ये धरती जग में निराली ,
फूल खिले डाली-डाली ।।

(राष्ट्रीय  स्तर पर चौथा स्थान  हासिल करने वाली मेरी इस कविता को श्री पार्थो दास ने संगीतबद्ध किया और श्रीमती अनुराधा गणेशन ने नृत्य निर्देशन किया )

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