Monday, March 5, 2012

होली  और तुम ......

 

फागुन की मस्ती लिए 
सतरंगे बादलों के पार से 
कल -कल बहती गंगा की धार से
उमंगो की नाव पर सवार
उछलती -मचलती बहती बयार
सुनहरी किरणों  की  चुनरी ओढ़कर
घाट  पर उतरी है आज ।

पदचाप सुनकर बेचैन हैं साज़
सर्द चेहरे पर धीरे-धीरे उभरती है आस |
चमकती हैं सहमी आस्था की आँखें |
खुलते  हैं किवाड़
आ पहुँची है बसन्ती  बयार |
मचल उठते हैं सारे रीति-रिवाज़ ।

नाच उठते हैं सारे ढोल-मजीरे 
घोटी जाती  है भांग कहीं नदी तीरे |
 बेचैन होते हैं कैद सारे अबीर-गुलाल 
छा जाने को आकाश में ।
 ठीक तभी ढूँढने लगता है मन 
तुम्हे यहीं- कहीं पास में  ।

जीने की इच्छा फिर लेती है अंगडाई 
पर बेचैन सी क्यों है आज, यादों की अमराई ।
बसंत -उत्सव का फिर जमने लगा है मेला
रंग है , मस्ती है, पर मन हुआ अकेला  ।।

बिखरने लगे हैं रंग 
निकलने लगी है टोली ।
व्याकुल मन ढूंढता है तुम्हे
कहाँ हो तुम, ऐ मेरे हमजोली । ।
     
      

     

1 comment:

  1. Bahut achshi rachana hai.jenai ki ichsha se he kheli jati hai jindagi ki holi.

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