तेरा शहर ये कितना अजीब है....
न कोई दोस्त है न रकीब है ।
तेरा शहर ये कितना अजीब है ।।
मैं किसे कहूँ मेरे साथ चल
यहाँ सब के सर पे सलीब है ।।
यहाँ किसका चेहरा पढ़ा करूँ
यहाँ कौन इतना करीब है ।।
वो जो इश्क था, वो जूनून था
ये जो हिज्र(जुदाई ) है, ये नसीब है ।।
निकोबार में बीत रहे हर एक पल को समर्पित .......
साभार : "विजन्स"-जगजीत सिंह
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