Friday, January 8, 2016


लेता है वक्त, हर शख्स का इम्तहान।

बच नही सकता इससे, कोई भी इंसान।।



हम महफूज हैं, सुकून-ए-अमन की फिजा में,
क्योंकि सरहद पर लुटाते हैं,  फौजी अपनी जान।।



होशो-हवास खोकर, दीवाने सी हुई उनकी हालत,
वतन की तकदीर लिखते थे जो, बनकर हुक्मरान।।



कुदरत भी अब, बदलने लगी है चेहरे,
ये हुनर भी इसे, आखिर सिखा गया इंसान।।



जमीर-ईमान, सब कुछ बिकता है यहाँ,
आदमी बन गया है, चलती फिरती दुकान।।



सुनते थे दोस्ती में, बसता है खुदा,
 बदलते वक्त में मगर, गुम हुई वो पहचान।।



तुझको पाने की हसरत, निकलेगी न दिल से,
तू चाहे जितना जोर लगा, या ले ले मेरी जान।।



बिछड़े दिल, क्या मिल पाते हैं कभी,
यक़ी नही होता सुनकर तेरी दास्तान।।



उन खुबसूरत एहसासों के नाम, कर दी जिंदगी हमने,
ऐ मौत तुझे दूँ मैं क्या, नही बचा अब कोई सामान।।



सह लेगा ‘अशोक‘ हर दर्द, गर  है तू उसके साथ,
टपकेंगे अश्क बेशक, पर बोलेगी सच ये जुबान।।

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