Wednesday, January 27, 2016

गुमनाम एहसास उनके, लौटेंगे कभी।

ज़मीर धिक्कारेगा तब, सोचेंगे कभी।।


औकात भूलकर, बने बैठे हैं खुदा,
जाना है चार कंधो पर, ये सच मानेंगे कभी।।



जो समझते हैं, खुद को शहंशाह,
छिन जाएगा ये ताज, तब पछताएंगे कभी।।



बेशक आज मुझे भूल जाएं वो,
पर यादों के जुगनू टिमटिमाएंगे कभी।।



क्या जुर्म किया, जो भुगते सज़ा,
वक्त आने पर ये सवाल पूछेंगे कभी।।



चल दिए आखिर, वो अपने सफर पर,
लेकिन मुड़कर रास्ते पर, हमें देखेंगे कभी।।



ये दिल है, कोई खिलौना नहीं,
एक दिन वे ये महसूस करेंगे कभी।। 



मायूस न हो, खुदगर्ज दुनिया में अशोक,
कुछ हाथ दुआओं के उठेंगे कभी।।

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