गर्मियों की छुट्टियों से लौटते वक्त...
आम की मिठास में
कोयल की कूक में
सावन के आने की खुशी में
झूमते मयूर की थिरकन में
गंगा मैया की सौम्य
शांत बहती लहरों में
बनारस की सुबह में
विश्वनाथ मंदिर की
बज उठती घंटियों की
मधुर तरंगों में
अयोध्या की शाम में
जब शरीर अपनी आत्मा तलाशते
जा पहुँचते हैं हनुमान गढ़ी
तब उस आत्मा के उल्लास में
उस जगतपालक के समक्ष
भीख मांगते हाथों की
प्रार्थना में
कृपा लुटाते
उस संकटमोचन की मुस्कान में
सैकड़ों थालों में सजी
आरती के फेरों में
सुन्दरकाण्ड का पाठ करते
योगी की अभीप्सा में
उस दैवी माटी से
फूटती किरणों की स्वर्णिम आभा में
नन्ही मासूम छुटकी की मुस्कान में
धरती माता की तरह
दुख झेलकर भी
खुशियाँ लुटाने को आतुर
उस माँ की ममता में
आँखों से निर्झर बहते
आंसुओं की धार में
मुझे सिर्फ तेरी मुस्कान नज़र आती है |
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