Tuesday, November 4, 2014

‘महिला सशक्तिकरण’ पर आयोजित पेंटिंग कार्यशाला से प्रभावित मन के गलियारोंसे निकले कुछ शब्द और शायद कुछ सवाल ....

सदियों की निराशा और वेदना के घने कोहरे का सीना चीरकर नवप्रभात के आगमन की प्रतीक्षा !

युगों से कंठ में दबी सिसकी, अब क्रान्तिघोष का रूप लेने को आतुर !

जीवन को पुनः परिभाषित करने को व्यग्र, आंदोलित हो रहा चिंतन !

फौलादी इरादे लिए शिखर तक पहुँचने का संकल्प !

याचनाएं छोड़कर अब संघर्ष मार्ग का चयन !

जर्जर हो चुके सामाजिक ढाँचे को नया आकार देने की बलवती होती मनःस्थिति !


असीम धैर्य, स्वाभिमान और आत्म विश्वास लिए कर्मक्षेत्र में अपनी चुनौतीपूर्ण भूमिका के लिए तैयार आज की नारी !

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