सच की तलाश में...
आँखों में
सपनो का इंद्र धनुष
और
उछलती मचलती
उमंगों की रफ़्तार लिए
एक दिन
मैं भी चल पडी
एक नदी की तरह
मैदानों, पठारों और
ऊसरों के बीच
रास्ता बनाते
मंजिल पाने का जूनून लिए
चमकते सूरज की
किरणों को समेटते
धुप-छाँव की
आंखमिचौली में
स्याह रातों की
खामोशी को
बड़े गौर सुनते
आस्था की कंपकंपाती लौ की
रोशनी में
मैं
बढ़ती ही जा रही थी
अपनी यात्रा में
लेकिन जिस दिन से चली हूँ
मंजिल पर नजर है
पर
इन आँखों ने कभी
मील का पत्थर देखा ही नहीं
बेचैन होकर
जब मैंने ऊपर देखा
तो अपनी पहचान को
वापस लौटते हुए पाया
आकाश के सूनेपन से
टकरा कर
और फिर..
मैं अपनी आँखों को
उस नदी में
डूबने से नहीं बचा पायी
जिसमे अभी-अभी
मैंने अपना अक्स देखा था ...
कि मैं एक जीती जागती
ज़िंदगी हूँ |