Tuesday, November 4, 2014

सच की तलाश में...

आँखों में
सपनो का इंद्र धनुष
और
उछलती मचलती
उमंगों की रफ़्तार लिए
एक दिन
मैं भी चल पडी
एक नदी की तरह

मैदानों, पठारों और
ऊसरों के बीच
रास्ता बनाते
मंजिल पाने का जूनून लिए
चमकते सूरज की
किरणों को समेटते
धुप-छाँव की
आंखमिचौली में

स्याह रातों की
खामोशी को
बड़े गौर सुनते
आस्था की कंपकंपाती लौ की
रोशनी में
मैं
बढ़ती ही जा रही थी
अपनी यात्रा में

लेकिन जिस दिन से चली हूँ
मंजिल पर नजर है
पर
इन आँखों ने कभी
मील का पत्थर देखा ही नहीं

बेचैन होकर
जब मैंने ऊपर देखा
तो अपनी पहचान को
वापस लौटते हुए पाया
आकाश के सूनेपन से
टकरा कर
और फिर..
मैं अपनी आँखों को
उस नदी में
डूबने से नहीं बचा पायी
जिसमे अभी-अभी
मैंने अपना अक्स देखा था ...

कि मैं एक जीती जागती
ज़िंदगी हूँ |


पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे अब्दुल कलाम के अंडमान आगमन पर

आज हमारे द्वीप पधारे
कलश मधु सा छलका ये मन |
प्यासे नैनों के दो मोती
करते स्वागत-अभिनन्दन ||

धरती, सूरज, चाँद, सितारे
आस लिए सब राह निहारे |
बिखरी खुशबू, महका उपवन
गीत खुशी के गाये नंदन ||

तेरे सुर पर झूमा ये जग
गीत जो गूंजे साज़ लिए |
बरस पड़े तुम मन-आँगन में
रंगों की बरसात लिए ||

हे नायक, तुम राज दुलारे
तेरी गाथा गायें जन-जन ||

राहों से फिर चुनकर कांटे
बढ़ते जाएँ बन कर मीत |
बिखरे तिनके, फिर जोड़ेंगे
हारे मन की होगी जीत ||

आओ फिर से सपने सजाएं,
आशा का थामें दामन ||
यात्रा के इस पड़ाव में आते-आते ....

मानव के साथ मेरा अटूट रिश्ता रहा है | सभ्यता के उद्भव के साथ ही मैं भी मनुष्य की विकास यात्रा में उसके साथ जुड़ गया, और तब से लेकर आज तक हम साथ-साथ चल रहे हैं |मानव के मानस में फैले आस्था के उजियारे में, उल्लास के गीतों में, जीवन के उत्कर्ष में, ज़िंदगी की धूप में और विषाद के हर क्षण में, मैंने उसकी संवेदनाओं को साफ़-साफ़ देखा है |

समय की आंधी भी उस जर्जर बूढ़े इतिहास पुरुष और आज के आदमी की संवेदनाओं को अलग नहीं कर पायी | मैंने इतिहास-पुरुष के वैभव को गगन चूमते  देखा है, जब राजा-महाराजाओं  की टकसालों के ऐश्वर्य में मेरा भाग्य चमक रहा था | सोने चांदी के आभूषणों से मैं अपने व्यक्तित्व को विराट होते देख रहा था |

लेकिन इन सबके बीच, अमीरी के बाज़ार में गरीबी का क्रंदन सुना है मैंने, और गरीब जेबों में अमीरी को मुस्कुराते देखा है | मनुष्य की लिप्सा, उदारता और अभीप्सा के हर रंग का साक्षी रहा हूँ मैं | मैंने करवट लेते समय के साथ वैभव के गगनचुम्बी साम्राज्य को झुक कर गरीबी से गले मिलते देखा है |


मनुष्य के भाग्य की तरह मेरा स्वरुप भी बदलता रहा, किन्तु हमारी ये यात्रा जारी रही | मेरे और मनुष्य की इस यात्रा में अनेक पड़ाव आये, लेकिन हम चलते रहे साथ –साथ......
‘महिला सशक्तिकरण’ पर आयोजित पेंटिंग कार्यशाला से प्रभावित मन के गलियारोंसे निकले कुछ शब्द और शायद कुछ सवाल ....

सदियों की निराशा और वेदना के घने कोहरे का सीना चीरकर नवप्रभात के आगमन की प्रतीक्षा !

युगों से कंठ में दबी सिसकी, अब क्रान्तिघोष का रूप लेने को आतुर !

जीवन को पुनः परिभाषित करने को व्यग्र, आंदोलित हो रहा चिंतन !

फौलादी इरादे लिए शिखर तक पहुँचने का संकल्प !

याचनाएं छोड़कर अब संघर्ष मार्ग का चयन !

जर्जर हो चुके सामाजिक ढाँचे को नया आकार देने की बलवती होती मनःस्थिति !


असीम धैर्य, स्वाभिमान और आत्म विश्वास लिए कर्मक्षेत्र में अपनी चुनौतीपूर्ण भूमिका के लिए तैयार आज की नारी !