यात्रा के इस पड़ाव में
आते-आते ....
मानव के साथ मेरा अटूट
रिश्ता रहा है | सभ्यता के उद्भव के साथ ही मैं भी मनुष्य की विकास यात्रा में
उसके साथ जुड़ गया, और तब से लेकर आज तक हम साथ-साथ चल रहे हैं |मानव के मानस में
फैले आस्था के उजियारे में, उल्लास के गीतों में, जीवन के उत्कर्ष में, ज़िंदगी की
धूप में और विषाद के हर क्षण में, मैंने उसकी संवेदनाओं को साफ़-साफ़ देखा है |
समय की आंधी भी उस जर्जर
बूढ़े इतिहास पुरुष और आज के आदमी की संवेदनाओं को अलग नहीं कर पायी | मैंने इतिहास-पुरुष
के वैभव को गगन चूमते देखा है, जब
राजा-महाराजाओं की टकसालों के ऐश्वर्य में
मेरा भाग्य चमक रहा था | सोने चांदी के आभूषणों से मैं अपने व्यक्तित्व को विराट
होते देख रहा था |
लेकिन इन सबके बीच, अमीरी
के बाज़ार में गरीबी का क्रंदन सुना है मैंने, और गरीब जेबों में अमीरी को
मुस्कुराते देखा है | मनुष्य की लिप्सा, उदारता और अभीप्सा के हर रंग का साक्षी
रहा हूँ मैं | मैंने करवट लेते समय के साथ वैभव के गगनचुम्बी साम्राज्य को झुक कर
गरीबी से गले मिलते देखा है |
मनुष्य के भाग्य की तरह
मेरा स्वरुप भी बदलता रहा, किन्तु हमारी ये यात्रा जारी रही | मेरे और मनुष्य की
इस यात्रा में अनेक पड़ाव आये, लेकिन हम चलते रहे साथ –साथ......
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