आहिस्ता आहिस्ता पहचान खोने लगते है एहसास ।
मगर ये जानते हैं वो कि कभी नही मरते हैं एहसास।।
उठती जरूर है जिंदगी में वक्त की आंधी।
मगर जीने की तमन्ना नही छोड़ते हैं एहसास।।
इनके साथ होता है जिंदगी भर का नाता।
आखरी सांस तक भी नही बिछड़ते हैं एहसास।।
लफ्जों का जब वो घोंटते हैं गला।
खामोशियों में तब सिसकियाँ भरते हैं एहसास।।
समझते है वो कि कर लिया खुद को जुदा।
नादानी पर उनकी, हँसते हैं एहसास।।
जख्म उधर हो या इधर, बात एक है।
क्योंकि दर्द की हर टीस पर सिहर उठते हैं एहसास।।
सरहदें खींच दो बेशक हमारे दरम्यान।
डोर दिलो की टूटती नही, कहते हैं एहसास।।
जाने क्या खो सा गया है।
तलाश में जिसकी, भटकते हैं एहसास।।
न कोई राह है, न मंजिल और न ठिकाना।
जाने किस सफर में, निकलते हैं एहसास।।
हो न मायूस, देख उनकी संगदिली ‘अशोक‘।
पत्थर दिल में भी लहू बन कर दौड़ते हैं एहसास।।
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ReplyDeleteअशोक जी आपकी ज़िन्दगी और अहसास से भरे इस ब्लॉग में अहसास कि जो कल्पना करते हुए आपने जो परिभाषा दी है, उसके कहने ही क्या है, इस तरह की कवितायें, लेख अब आप हिंदी कि पहली ब्लॉगिंग व सोशल वेबसाइट शब्दनगरी में भी लिखकर अपने लेखो को पाठक तक पहुंचाकर, अन्य रचनाकारों कि कहानियों, ओ लेखों का आनंद उठा सकतें हैं |
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