Friday, March 13, 2020

अब रैन कहाँ रे... 

जाग मुसाफिर अब क्या सोवत 
भोर भई अब रैन कहाँ रे |
ज्ञान से महकी सारी दिशाएँ 
तेरी मंज़िल तुझको पुकारे ||

बरसों  बीते भाग पे रोते 
सूख गईं अँखियों की नदियां |

जीवन के दिन ऐसे बीते 
बीत गईं हों जैसे सदियाँ |
|
दीप जला अपने हाथो से 
कर ले जीवन मे उजियारे ||

विद्यालय है ज्ञान का मंदिर
अक्षर के यहाँ दीप जले हैं |

उड़ता जाये मन का पंछी 
पलकों पे फिर सपने सजे हैं ||

सुख दुख के सब भेद हैं खुलते,
आते जब हम इसके द्वारे ||

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