अब रैन कहाँ रे...
जाग मुसाफिर अब क्या सोवत
भोर भई अब रैन कहाँ रे |
ज्ञान से महकी सारी दिशाएँ
तेरी मंज़िल तुझको पुकारे ||
बरसों बीते भाग पे रोते
सूख गईं अँखियों की नदियां |
जीवन के दिन ऐसे बीते
बीत गईं हों जैसे सदियाँ |
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दीप जला अपने हाथो से
कर ले जीवन मे उजियारे ||
विद्यालय है ज्ञान का मंदिर
अक्षर के यहाँ दीप जले हैं |
उड़ता जाये मन का पंछी
पलकों पे फिर सपने सजे हैं ||
सुख दुख के सब भेद हैं खुलते,
आते जब हम इसके द्वारे ||
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