Friday, February 24, 2012

रहना तुम संग- संग..........



फूल में ताज़गी बन कर

पलकों में नमी बन कर 

दुआओं में रौशनी बन कर

मौत में ज़िंदगी बन कर ।

 रहना तुम संग- संग..........
धरती बहुत बड़ी है  माँ


मेरे पाँव बहुत छोटे हैं,
धरती बहुत बड़ी है  माँ ।

मेरी उंगली थामे मेरे
बिलकुल पास खड़ी रह माँ ।।

जब भी घिरे दुःख के बादल,
छोड़ चले जब सारे मीत ।

सात सुरों के तार सजाकर,
लेकर आयी तुम जीवन गीत ।।

मरुस्थलों के तपते पथ पर,
तू ही मेघ झड़ी है माँ  ।।

जिसको पानी है अपनी मंजिल,
उसको तो चलना ही होगा।

मौसमों के गतिमान चक्र में,
उसको तो गलना ही होगा ।।

ऋतु-चक्रों की हर बेला में,
तू ही पुष्प लड़ी है माँ ।।

चलती जाती दुनिया सपनो की,
जब तक है साँसों का मेल ।

मिलना बिछुड़ना और फिर मिलना,
ये तो है जन्मो का खेल ।।

जन्म-जन्म के इस बंधन की,
तू ही स्वर्ण कड़ी है माँ  ।। 

मेरे पाँव बहुत छोटे हैं,
धरती बहुत बड़ी है  माँ ।

मेरी उंगली थामे मेरे
बिलकुल पास खड़ी रह माँ ।।


(प्रेरणा- पत्रिका "आजकल")
       

Friday, February 17, 2012

जीवन की मुस्कान समर्पित...


जीवन की मुस्कान समर्पित ........                                                                       
 उस मासूम को
जिसकी मुस्कान में 
अपनी ज़िंदगी को
मुस्कुराते  देखा

सुख-दुःख की आँख मिचौली में 
आस की एक बाती हरदम
जगमगाते देखा ....   

वक़्त के उस दौर को
जब बिखरे हुए 
ज़िंदगी के रास्ते
मुड़कर
उस और हो चले
जिधर
उस मासूम के कदमो को 
बढ़ते देखा.........

उन स्याह रातों को
जब
आकाश को
एकटक तकती आँखों में   
सपनो की बारात  को उतरते देखा.......

ज़िंदगी के उन पलों को 
जब
खुशी और गम के मायनों को
एक मुस्कान में सिमटते देखा.....

उन लम्हों को 
जिनमे 
सपनो को पंख लगाए 
दूर.....गगन में
उड़ते देखा......

उस तमन्ना को
जब
मुट्ठी भर आसमान की चाहत में
हाथो की लकीरों को
बनते और बिगड़ते देखा.......

उन दुआओं को
जिनकी बुनियाद पर बनी राहों को
मंजिल से
मिलते देखा....

उस माँ को 
जिसकी
ममता की छाया में
आकाश के विस्तार को
झुकते देखा......      

तिनका-तिनका जोड़कर 
बने यादों के उस घरौंदे को
जिसमे
ज़िंदगी को कभी 
बसर करते देखा......

उस खामोशी को
गिरफ्त में जिसकी
आवाजों को 
दम तोड़ते देखा..... 

और समर्पित उसको....
जो हर वक़्त  है मेरे साथ-साथ..
ज़िंदगी की धूप में..
गम के साए में..
आस्था के उजियारे में..
दुआओं में..
संवेदनाओं में..

और आज फिर
 उसकी याद में 
इन पलकों को 
भीगते देखा.....

 

  

Saturday, February 11, 2012

हमारी मधुशाला 
(समर्पित- मधुशाला के महान रचनाकार स्वर्गीय बच्चन जी को )
भटका दर-दर इधर उधर मैं ,
 लेकर हाथों में प्याला ।
मिला न कोई संगी-साथी ,
न ही मिली साकी बाला ।। 

होठों की तृष्णा लेकर मैं,
निकल  पड़ा अपनी धुन मे ;

सतरंगी  आकाश से  उतरी, 
 तभी  मनोहर मधुशाला ।। 

न जाने कौन घड़ी वो थी,
भा गया जो मुझको प्याला ।
सुबह  शाम औ आठ प्रहर बस,
याद आती साकी  बाला ।।

नशा दिन ब दिन चढ़ता जाता ,
बढ़ती जाती इसकी तासीर ;

न जाने क्या  अंजाम जुनूँ की 
  दिखलाएगी मधुशाला ।।  

मील के पत्थर दिख ही जाते,
चलता जाता जो मतवाला ।
होना न मायूस कभी तुम ,
ये मौसम है जाने वाला ।।

लाख जतन से भी सबको ये,
नहीं मिलता प्याला यारों;

उसका जीना ही सफल है मित्रों,
देखी जिसने ये मधुशाला ।।  
  खींच कल्पना के चित्रों को,
भरता जाता मैं प्याला।
खुमारी दिन दिन बढ़ती जाती,
ऐसी मादक है ये हाला।।

चाहत सपनो अरमानो का,
पता नहीं कल फिर क्या हो;

दिल से पर ये दुआ निकलती,
बनी रहे ये मधुशाला।।    
मधु रस में भीगे फूलों से,
सजा रहा मंदिर द्वारा।
बेरंगी चादर पर बरसी,
रंग बसन्ती की धारा।।

सीने में पलते अरमानो को,
भले न मैं कह पाऊं पर;

दिन रात प्रहर तेरी यादों से,
रौशन मेरी मधुशाला ।।      
तुझको क्या समझाऊं साकी,
हाथ मेरे भी है प्याला।
तन मन प्राण दहकते जाते,
हाय ये कैसी है ज्वाला।।

न जाने कब वो मधु घट लेकर 
उतर पड़े इस धरती पर;

इसी आस में राह निहारे,  
     मेरी प्यासी मधुशाला।।       
मधु सरिता में बहता मेरा मन,
आज हुआ फिर मतवाला।
पर तुम क्यों हो चुप- चुप से इतने,
पीकर मधु घट का प्याला ।।

मधु लुटाने को आतुर फिर
आज हुआ मयंक देखो;   

आ जाओ तुम भी हे परमहंस,
कि हुई है व्याकुल मधुशाला।।
खुशियों के जाम छलकते जाएँ ,
कभी न हो खाली प्याला।
होना न मायूस कभी तुम
 साथ जो तेरे है हाला।। 

मिल जाएँ मुझको तेरे सारे गम,
खुशियाँ मेरी सब नाम तेरे;

खुश रहना मेरे ऐ दोस्त हमेशा ,
दुआ ये देती मधुशाला।।

मधु लुटाते राम  सभी को 
हम सब  हैं पीनेवाले  ।
काम  हमारा  बस चलना  है 
कहते दुनिया  के रखवाले ।।

मत घबराना  आ जाती जो, 
राह में तेरी बाधाएं ;

ये खेल  हैं सारे सियाराम के 
संसार  है उनकी मधुशाला ।।    
  
ज़िंदगी तुम्ही से...

सपने तुम्ही से 
नग्मे तुम्ही से 

आरज़ू तुम्ही से
जुस्तजू तुम्ही से 

अरमान तुम्ही से
बागबान तुम्ही से

यादें तुम्ही से 
वादे  तुम्ही से 

उजियारा तुम्ही से 
सहारा तुम्ही से 

कोशिशें तुम्ही से 
ख्वाहिशें तुम्ही से 

तन्हाई तुम्ही से 
मसीहाई तुम्ही से 

बंदगी तुम्ही से 
ज़िंदगी तुम्ही से 

कारवां तुम्ही से 
हौसला तुम्ही से ।।

मीत मेरे ।

हों राहें तुम्हारी हरदम रौशन ,
खुशियों की लहरों पे डोले मन ।

हर अवसर बने जीवन का उत्सव,
खुशियाँ सारी हों नाम तेरे ।।

मीत मेरे ।

तुम्हारे गम हों मेरी आहें,
तुम्हारी खुशियाँ मेरी राहें ।

जश्न ज़िंदगी के जब भी हों, 
जाम उछलेंगे नाम तेरे ।।

मीत मेरे ।

Saturday, February 4, 2012

आ जाते जो तुम एक बार... 

आ जाते जो तुम एक बार,
जी उठता मेरा संसार ।।

जाने कितने मतवालों ने, 
अपना खून बहाया था ।
तुम जैसे कितने लालों ने, 
माता को शीश  चढ़ाया  था  ।।
नहीं भूलता  महाकाल भी,
सत्तावन  की  वो  तलवार  ।।   
 आ जाते जो तुम एक बार... 
                                            
 सरफरोशी  के  जूनून  में , 
निकल  पड़े तुम बीच  समर  में ।
माटी  का  है  क़र्ज़  चुकाना , 
ठान  लिया  जो तुमने  मन  में ।। 
काँप उठा सुनकर बैरी फिर, 
छेड़ी  जो तुमने हुंकार ।।
 आ जाते जो तुम एक बार...

सत्य अहिंसा की लाठी ले,
छेड़ दिया तुमने संग्राम ।
सत्याग्रह का मंत्र जो गूंजा ,
चारों ओर मचा कोहराम ।।
भाग चला फिर दुश्मन  रण से, 
सुनकर तेरी वो ललकार ।।
 आ जाते जो तुम एक बार...

रंग बसन्ती की धारा में,
भीगा मन मेरा भी रिमझिम।
तारो  की बिखरी अंगनाई, 
जाग उठे हैं सपने झिलमिल ।। 
सुन ओ प्यारी पिया बसन्ती, 
मन की तरुणाई करे पुकार ।।
 आ जाते जो तुम एक बार...

जब से गए हो सब नीरस है,
सूना है अपना घर  आँगन ।
 सुख-दुःख के हर पलछिन में,
तुम्हे ही दूंढता मेरा जीवन ।।
जीना है तो जी ही लेंगे पर,
नहीं सूखती अश्रुधार ।।   
 आ जाते जो तुम एक बार...

दुनिया है ये एक सराय,
चार दिनों का है ये डेरा।
उड़ जाएगा पंछी एक दिन,
छोड़ के प्यारे रैन बसेरा ।।
                                                            हुए हो क्यों तुम, गुम फिर ऐसे,
छू कर मेरे मन के तार ।। 
आ जाते जो तुम एक बार ।
 जी उठता मेरा संसार ।।