Saturday, February 11, 2012

हमारी मधुशाला 
(समर्पित- मधुशाला के महान रचनाकार स्वर्गीय बच्चन जी को )
भटका दर-दर इधर उधर मैं ,
 लेकर हाथों में प्याला ।
मिला न कोई संगी-साथी ,
न ही मिली साकी बाला ।। 

होठों की तृष्णा लेकर मैं,
निकल  पड़ा अपनी धुन मे ;

सतरंगी  आकाश से  उतरी, 
 तभी  मनोहर मधुशाला ।। 

न जाने कौन घड़ी वो थी,
भा गया जो मुझको प्याला ।
सुबह  शाम औ आठ प्रहर बस,
याद आती साकी  बाला ।।

नशा दिन ब दिन चढ़ता जाता ,
बढ़ती जाती इसकी तासीर ;

न जाने क्या  अंजाम जुनूँ की 
  दिखलाएगी मधुशाला ।।  

मील के पत्थर दिख ही जाते,
चलता जाता जो मतवाला ।
होना न मायूस कभी तुम ,
ये मौसम है जाने वाला ।।

लाख जतन से भी सबको ये,
नहीं मिलता प्याला यारों;

उसका जीना ही सफल है मित्रों,
देखी जिसने ये मधुशाला ।।  
  खींच कल्पना के चित्रों को,
भरता जाता मैं प्याला।
खुमारी दिन दिन बढ़ती जाती,
ऐसी मादक है ये हाला।।

चाहत सपनो अरमानो का,
पता नहीं कल फिर क्या हो;

दिल से पर ये दुआ निकलती,
बनी रहे ये मधुशाला।।    
मधु रस में भीगे फूलों से,
सजा रहा मंदिर द्वारा।
बेरंगी चादर पर बरसी,
रंग बसन्ती की धारा।।

सीने में पलते अरमानो को,
भले न मैं कह पाऊं पर;

दिन रात प्रहर तेरी यादों से,
रौशन मेरी मधुशाला ।।      
तुझको क्या समझाऊं साकी,
हाथ मेरे भी है प्याला।
तन मन प्राण दहकते जाते,
हाय ये कैसी है ज्वाला।।

न जाने कब वो मधु घट लेकर 
उतर पड़े इस धरती पर;

इसी आस में राह निहारे,  
     मेरी प्यासी मधुशाला।।       
मधु सरिता में बहता मेरा मन,
आज हुआ फिर मतवाला।
पर तुम क्यों हो चुप- चुप से इतने,
पीकर मधु घट का प्याला ।।

मधु लुटाने को आतुर फिर
आज हुआ मयंक देखो;   

आ जाओ तुम भी हे परमहंस,
कि हुई है व्याकुल मधुशाला।।
खुशियों के जाम छलकते जाएँ ,
कभी न हो खाली प्याला।
होना न मायूस कभी तुम
 साथ जो तेरे है हाला।। 

मिल जाएँ मुझको तेरे सारे गम,
खुशियाँ मेरी सब नाम तेरे;

खुश रहना मेरे ऐ दोस्त हमेशा ,
दुआ ये देती मधुशाला।।

मधु लुटाते राम  सभी को 
हम सब  हैं पीनेवाले  ।
काम  हमारा  बस चलना  है 
कहते दुनिया  के रखवाले ।।

मत घबराना  आ जाती जो, 
राह में तेरी बाधाएं ;

ये खेल  हैं सारे सियाराम के 
संसार  है उनकी मधुशाला ।।    
  

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