Friday, February 24, 2012

धरती बहुत बड़ी है  माँ


मेरे पाँव बहुत छोटे हैं,
धरती बहुत बड़ी है  माँ ।

मेरी उंगली थामे मेरे
बिलकुल पास खड़ी रह माँ ।।

जब भी घिरे दुःख के बादल,
छोड़ चले जब सारे मीत ।

सात सुरों के तार सजाकर,
लेकर आयी तुम जीवन गीत ।।

मरुस्थलों के तपते पथ पर,
तू ही मेघ झड़ी है माँ  ।।

जिसको पानी है अपनी मंजिल,
उसको तो चलना ही होगा।

मौसमों के गतिमान चक्र में,
उसको तो गलना ही होगा ।।

ऋतु-चक्रों की हर बेला में,
तू ही पुष्प लड़ी है माँ ।।

चलती जाती दुनिया सपनो की,
जब तक है साँसों का मेल ।

मिलना बिछुड़ना और फिर मिलना,
ये तो है जन्मो का खेल ।।

जन्म-जन्म के इस बंधन की,
तू ही स्वर्ण कड़ी है माँ  ।। 

मेरे पाँव बहुत छोटे हैं,
धरती बहुत बड़ी है  माँ ।

मेरी उंगली थामे मेरे
बिलकुल पास खड़ी रह माँ ।।


(प्रेरणा- पत्रिका "आजकल")
       

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