Friday, March 6, 2020


अद्भुत प्राकृतिक सौन्दर्य को समेटे अमर स्वातंत्र्य वीरों की  धरती
अंडमान निकोबार द्वीप पुंज

अमर शहीदों का ये मंदिर
सारे जहां मे सबसे सुंदर | 
श्रद्धा के हम फूल चढ़ाएँ,
इनकी कहानी भूल न जाएँ ||

सारे जहां से सुंदर
'अंडमान' द्वीप हमारा |
सागर मे  मोतियों सा
'निकोबार' द्वीप प्यारा ||

कुदरत का है एक करिश्मा
देखो 'लाइम-केव' ये अपना |
पंछी गाये गीत खुशी के
'पैरट' द्वीप है सबका सपना ||

'सेल्यूलर' और 'रॉस' मे  बसती
सदियों की एक अमर कहानी |
नाचा था कभी मोर मयूरा
ये गाथा होगी न पुरानी ||

आओ चलें हम उस दुनिया मे
रहती हैं जहां जल की परियाँ ||
'जौली-बोय' की इन लहरों मे
बजती हों जैसे पायलिया  ||

मजहब की दीवार नहीं है
भाषा की तकरार  नहीं है |
एक लहू है, एक तिरंगा
बसता दिलों मे प्यार वही है ||

सारे जहां से सुंदर
'अंडमान' द्वीप हमारा |
सागर मे  मोतियों सा
'निकोबार' द्वीप प्यारा ||


( पोर्ट ब्लेयर मे द्वीप पर्यटन उत्सव के उद्घाटन अवसर पर  इस गीत पर  नृत्य निर्देशिका श्रीमती सी॰ जे ॰ मेरी, अनुराधा गनेशन और जाने माने गायक अविनाश के निर्देशन मे मनमोहक नृत्य प्रस्तुत किया गया )

Wednesday, April 27, 2016

आहिस्ता आहिस्ता पहचान खोने लगते है एहसास ।
मगर ये जानते हैं वो कि कभी नही मरते हैं एहसास।।

उठती जरूर है जिंदगी में वक्त की आंधी।
मगर जीने की तमन्ना नही छोड़ते हैं एहसास।।

इनके साथ होता है जिंदगी भर का नाता।
आखरी सांस तक भी नही बिछड़ते हैं एहसास।।

लफ्जों का जब वो घोंटते हैं गला।
खामोशियों में तब सिसकियाँ भरते हैं एहसास।।

समझते है वो कि कर लिया खुद को जुदा।
नादानी पर उनकी, हँसते हैं एहसास।।

जख्म उधर हो या इधर, बात एक है।
क्योंकि दर्द की हर टीस पर सिहर उठते हैं एहसास।।

सरहदें खींच दो बेशक हमारे दरम्यान।
डोर दिलो की टूटती नही, कहते हैं एहसास।।

जाने क्या खो सा गया है।
तलाश में जिसकी, भटकते हैं एहसास।।

न कोई राह है, न मंजिल और न ठिकाना।
जाने किस सफर में, निकलते हैं एहसास।।

हो न मायूस, देख उनकी संगदिली ‘अशोक‘।
पत्थर दिल में भी लहू बन कर दौड़ते हैं एहसास।।

Wednesday, January 27, 2016

गुमनाम एहसास उनके, लौटेंगे कभी।

ज़मीर धिक्कारेगा तब, सोचेंगे कभी।।


औकात भूलकर, बने बैठे हैं खुदा,
जाना है चार कंधो पर, ये सच मानेंगे कभी।।



जो समझते हैं, खुद को शहंशाह,
छिन जाएगा ये ताज, तब पछताएंगे कभी।।



बेशक आज मुझे भूल जाएं वो,
पर यादों के जुगनू टिमटिमाएंगे कभी।।



क्या जुर्म किया, जो भुगते सज़ा,
वक्त आने पर ये सवाल पूछेंगे कभी।।



चल दिए आखिर, वो अपने सफर पर,
लेकिन मुड़कर रास्ते पर, हमें देखेंगे कभी।।



ये दिल है, कोई खिलौना नहीं,
एक दिन वे ये महसूस करेंगे कभी।। 



मायूस न हो, खुदगर्ज दुनिया में अशोक,
कुछ हाथ दुआओं के उठेंगे कभी।।

Friday, January 8, 2016


लेता है वक्त, हर शख्स का इम्तहान।

बच नही सकता इससे, कोई भी इंसान।।



हम महफूज हैं, सुकून-ए-अमन की फिजा में,
क्योंकि सरहद पर लुटाते हैं,  फौजी अपनी जान।।



होशो-हवास खोकर, दीवाने सी हुई उनकी हालत,
वतन की तकदीर लिखते थे जो, बनकर हुक्मरान।।



कुदरत भी अब, बदलने लगी है चेहरे,
ये हुनर भी इसे, आखिर सिखा गया इंसान।।



जमीर-ईमान, सब कुछ बिकता है यहाँ,
आदमी बन गया है, चलती फिरती दुकान।।



सुनते थे दोस्ती में, बसता है खुदा,
 बदलते वक्त में मगर, गुम हुई वो पहचान।।



तुझको पाने की हसरत, निकलेगी न दिल से,
तू चाहे जितना जोर लगा, या ले ले मेरी जान।।



बिछड़े दिल, क्या मिल पाते हैं कभी,
यक़ी नही होता सुनकर तेरी दास्तान।।



उन खुबसूरत एहसासों के नाम, कर दी जिंदगी हमने,
ऐ मौत तुझे दूँ मैं क्या, नही बचा अब कोई सामान।।



सह लेगा ‘अशोक‘ हर दर्द, गर  है तू उसके साथ,
टपकेंगे अश्क बेशक, पर बोलेगी सच ये जुबान।।

Monday, March 9, 2015

‘अंडमान दिवस’ 

10 मार्च 1858 को सिमरेमिस नामक जहाज से 200 बंदियों का जत्था ही केवल अंडमान नहीं आया, बल्कि साथ आई त्याग और बलिदान की कभी न भूली जा सकने वाली वो कहानी, जिसके किरदारों ने अपनी तकदीर को इस जमीन से जोड़कर एक नए इतिहास की रचना की |


उनकी पलकों के सपने थके जरूर थे, घायल जरूर थे,पर मरे नहीं थे | क्योंकि वतन की राह पर सब कुछ लुटाने की ख्वाहिश लिए, सर पर कफ़न बांधकर चले उन दीवानों को शायद, तकदीर का हर फैसला मंज़ूर था |

10 मार्च की उस तारीख से आज तक, अंडमान की इस धरती ने 150 वर्षों से भी अधिक समय की लम्बी यात्रा तय की है | यात्रा में धूप-छाँव, बरसात और बसंत के कई मौसम आये, लेकिन यात्रा फिर भी जारी रही |


आज़ादी के उन दीवानों की टोली से बस्ती तक...

और बस्ती से लेकर दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने का हौसला लिए आज के अंडमान तक की ये यात्रा ... आज़ादी, जूनून और ज़िंदगी की कहानी ही बयान करती है |

.... लेकिन ज़रा सुनिए तो.. ये हवा हमसे क्या कहना चाह रही है | आईये चलें..अपनी जड़ों की ओर...महसूस करें उन पलों की गर्माहट को..और अपने कर्म को उस दिशा में मोड़कर इस धरती को बनाये, उनके सपनों का अंडमान |


‘अंडमान दिवस’ की सभी द्वीपवासियों को शुभकामनाएं |




साभार: कार्यक्रम ‘आमने-सामने’,आकाशवाणी,पोर्ट ब्लेयर 

Sunday, January 4, 2015

आखिर आतंकवाद का खूनी खेल कब तक ?

रक्त-रंजित संस्कृति है,
नर पिशाच करते हैं तांडव |

पराकाष्ठा क्षमादान की,
नीलकंठ बन खडा है मानव ||

आखिर..

नर के भेस में, पिशाच की आकृति कब तक |
नियति मान निर्दोष प्राणों की आहुति कब तक |
मानव रक्त की नरभक्षी को स्वीकृति कब तक |
काल के क्रूर पाश में घायल संस्कृति कब तक |


Thursday, January 1, 2015

                                नव वर्ष की सभी दोस्तों को शुभकामनाएं |
करें स्वागत हम नए वर्ष का ||
नया साल दे रहा है दस्तक,

मुस्कान खिल उठी फिर अधरों पर |

भूल कर कडवाहट हम सब 

करें आह्वान फिर उत्कर्ष का ||

करें स्वागत हम नए वर्ष का ||
नए स्वप्न, उम्मीदों को ले फिर,

चले नए सफ़र पर यारों |

हम सब मिल कर करें जो कोशिश,

नामुमकिन कुछ भी नहीं यारों ||

आशा के हम दीप जब दीप जलाकर 

अभिनन्दन हम करें हर्ष का ||

करें स्वागत हम नए वर्ष का ||
भूली ना जा सकेंगी हमसे

बीते वर्ष की सुनहरी यादें |

खुशहाली की चाह में हमने 

किये थे फौलादी वो इरादे ||

पुकारती है मंजिल फिर हमको 

साथ न छोड़े अपने संकल्प का ||

करें स्वागत हम नए वर्ष का ||