प्रभु श्री राम जी समुद्र तट बैठे हुए समुद्र से उस पार जाने हेतु रास्ता मांग रहे हैं । अनुनय विनय करते हुए तीन दिन बीत गए और कृपालु राम जी का धीरज टूट गया और वे क्रोधित हो गए :
बिनय न मानत जलधि जड गए तीन दिन बीति ।
बोले राम सकोप तब, भय बिनु होइ न प्रीति ।।
लछिमन बान सरासन आनू ।
सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू ।।
वे लक्ष्मण से बोले- ' हे लक्ष्मण! मेरा अग्नि बाण लाओ । मैं इस समुद्र को अभी सुखाए देता हूँ ।'
प्रभु ने कहा:
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती ।
सहज कृपन सन सुन्दर नीती ।।
ममता रत सन ग्यान कहानी ।
अति लोभी सन बिरति बखानी ।।
क्रोधिहि सम कामिहि हरिकथा ।
ऊसर बीज बएं फल जथा ।।
" मूर्ख से विनय, कुटिल से प्रीति, कंजूस से सुंदर नीति, मोह माया में फंसे मनुष्य से ज्ञान की कथा, लोभी से वैराग्य का वर्णन, क्रोधी से शांति की बात, कामी पुरूष से भगवान की कथा, इस प्रकार व्यर्थ हो जाती है, जैसे ऊसर भूमि में बीज बोना व्यर्थ हो जाता है ।"
स्मरण मात्र से राम भक्तों का उद्धार करने वाले, संकटों से पार लगाने वाले, अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता हनुमान स्वामी महाराज सबका मंगल करें, कष्ट हरें, जीवन सफल करें ।
🌷 जय सिया राम 🌷
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