Monday, September 28, 2020

जय सियाराम 4

 प्रभु श्री राम के क्रोध से भयभीत हो समुद्र ने हाथ जोडकर अनुनय विनय करते हुए कहा-

प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई  ।

उतरिहि कटकु न मोरि बडाई ।।

प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई ।

करौं सो बेगि जो तुम्हहि सोहाई ।।

" आपका अग्नि बाण तो समुद्र को सोख देगा । मैं सूख जाऊँगा, लेकिन मर्यादा नही रहेगी । तथापि प्रभु जैसा चाहते हैं, वैसा ही होता है, ऐसा वेद गाते हैं । अब आपको जो अच्छा लगे, मैं वही करूँ । "

समुद्र से ऐसे नम्रता भरे वचन सुनकर प्रभु ने समुद्र से ही उपाय पूछा तो समुद्र ने कहा कि-

नाथ नील नल कपि द्वौ भाई ।

लरिकाई रिषि आसिष पाई ।।

तिन्ह के परस किएं गिरि भारे ।

तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे ।।

"आपकी सेना में नल व नील दो ऐसे बंदर हैं,  जिनके स्पर्श करने पर ऋषि के आशीर्वाद से बडे बडे पत्थर भी तैरने लगेंगे ।"

 प्रभु श्री राम के हर प्रकल्प में साथ रहने को अपना परम सौभाग्य समझने वाले, दीन दुखियों के कष्ट हरने वाले, वर्तमान में अयोध्या के राज पालक हनुमान स्वामी महाराज आपकी मनोकामनाएँ पूरी करें ।

🌷 जय सियाराम 🌷

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