Monday, September 28, 2020

जय सियाराम 6

 हनुमानजी ने,प्रभु श्री राम को लंका दहन और सीता मैया की खोज का पूरा वृत्तांत सुनाया। सुनकर प्रभु राम ने भावाकुल होकर कहा कि" संसार में तुम्हारे समान उपकारी कोई नही है। इसके बदले मैं तुम्हें क्या दे सकता हूँ! मै तो तुम्हारे सम्मुख देख भी नही सकता ।" गोस्वामी तुलसीदास लिखते हैं:  ब्रह्माण्ड के स्वामी के मुख से यह सुनकर हनुमानजी,

सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख, गात हरषि हनुमंत 

चरण परेउ प्रेमाकुल, त्राहि त्राहि भगवंत ।।

व्याकुल होकर उनके चरणों में गिर पडे और प्रेम मग्न हो गए । प्रभु श्री राम ने बलात् उन्हें उठाकर ह्रदय से लगाया और अनन्य भक्ति का वरदान दिया। 

प्रभु राम ने पूछा कि हनुमान तुमने कैसे रावण की मजबूत सुरक्षित लंका में घुसकर उसका दहन किया? यह सुनकर हनुमानजी ने अभिमान रहित वचन कहे: 

साखामृग कै बडि मनुसाई ।

साखा तें साखा पर जाई।।

नाहि सिंधु हाटकपुर जारा ।

निसिचर गन बधि बिपिन उजारा ।।

सो सब तव प्रताप रघुराई ।

नाथ न कछु मोरि प्रभुताई ।।

" वानर का स्वभाव तो केवल एक डाल से दूसरी डाल तक कूदना भर है। समुद्र लांघ कर सोने का नगर जलाना तथा राक्षसों को मारकर अशोक वन को उजाडना, यह सब तो आपका ही प्रताप है। इसमे मेरी कुछ प्रभुता नही है। प्रभु जिस पर आप प्रसन्न हों, उसके लिए कुछ भी अगम नही है।"

हनुमानजी ने आगे कहा:

नाथ भगति अति सुखदायनी ।

देहु कृपा करि अनपायनी।।

"हनुमानजी ने प्रभु से निश्छल भक्ति मांगी ।"

और भगवान ने 

"सुनि कपि परम सरल कपि बानि।

एवमस्तु तब कहेउ भवानी ।।"

सहर्ष 'एवमस्तु ' कहा ।

अपने सम्पूर्ण पुरुषार्थ के फल का श्रेय विनीत भाव से प्रभु श्री राम को देने वाले, निरंतर राम भक्ति मे लीन रहकर सबका कल्याण करने वाले, अयोध्या के हनुमान गढी के राजा संकट मोचन स्वामी हमें  विपत्तियों से पार पाने का संबल प्रदान करें, राम नाम के रसायन से  सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें, यही याचना करते हैं ।

🌷सियावर रामचंद्र की जय 🌷

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