Monday, September 28, 2020

जय सियाराम 7

 श्री हनुमानजी ने अहंकारी रावण के समक्ष प्रभु श्री राम की शक्ति और भक्ति का वर्णन करते हुए उसे प्रभु की शरण मे जाने का आग्रह किया । लेकिन रावण ने उपहास कर, खीझते हुए उन्हें मारने का आदेश दिया । विभीषण ने आपत्ति जताई कि दूत को मारना नीति विरोध है और फिर अंत में रावण ने पूंछ जलाने की आज्ञा दी ।

 सुनकर हनुमानजी मुस्कुराए और गोस्वामी तुलसीदास ने इस दृश्य का वर्णन कुछ इस प्रकार किया है :

बचन सुनत कपि मन मुस्काना ।

भइ सहाय सारद मैं जाना ।

रहा न नगर बसन घृत तेला ।

बाढी पूंछ कीन्ह कपि खेला ।।

हनुमानजी ने पूंछ इतनी बढा दी कि लंका में कपडा और घी या तेल बचा ही नही । पूंछ मे आग लगा दी गई और राक्षस उन्हें नगर में घुमाने लगे, बच्चे ताली पीटकर हंसने लगे । हनुमानजी ने यही सही अवसर समझा और फिर उछलकर एक महल से दूसरे महल पर जाकर उन्हे भस्म करने लगे । राक्षस प्राण बचाकर भागने लगे ।

हरि प्रेरित तेहि अवसर, चले मरूत उनचास ।

अट्टहास करि गर्जा कपि बढि लाग अकास ।।

 सारी लंका धू धू कर जलने लगी ।

उलटि पलटि लंका सब जारि ।

कूदि परा पुनि सिंधु मझारि ।।

प्रभु श्री राम की भक्ति से विमुख करने वाली हमारे चित्त की सारी नकारात्मक वृत्तियों को भस्म कर, ह्रदय  के सिंहासन पर श्री राम को विराजमान कर, पवनपुत्र हनुमानजी हमारा उद्घार करें..हमारे मन से कभी श्री राम का वनवास न हो..यह जीवन उनके चरणों में समर्पित हो, ऐसा वरदान दें..

🌷सियावर रामचंद्र की जय 🌷

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